
मुंबई। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ती तनातनी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को कारोबार के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी में उतार-चढ़ाव बना रहा। निवेशकों की नजर बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और आगे की ब्याज दरों को लेकर संकेतों पर रही।
Sensex और Nifty मामूली गिरावट के साथ बंद
दिनभर के उतार-चढ़ाव के बाद बीएसई सेंसेक्स 12.99 अंक यानी 0.02 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,944.28 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं एनएसई निफ्टी 24.60 अंक यानी 0.10 प्रतिशत फिसलकर 24,055.80 पर बंद हुआ। हालांकि कारोबार के दौरान दोनों प्रमुख सूचकांकों में इससे कहीं अधिक गिरावट देखने को मिली थी और बाद में क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान बाजार ने नुकसान का बड़ा हिस्सा संभाल लिया।
शुरुआती कारोबार में भी बाजार दबाव में रहा। सेंसेक्स करीब 121 अंक गिरकर 76,835 के आसपास और निफ्टी लगभग 53 अंक नीचे 24,028 के स्तर पर पहुंच गया था। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक ऊंची तेल कीमतों और अमेरिका-ईरान तनाव ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के साथ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड करीब 91.22 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि बाद के वैश्विक कारोबार में तेल की कीमतों में और तेजी देखी गई। इससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए चिंता बढ़ती है, क्योंकि महंगा कच्चा तेल आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव डाल सकता है।
विशेषज्ञों की नजर खास तौर पर पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों पर बनी हुई है। यदि तनाव के कारण तेल आपूर्ति बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में और तेजी आ सकती है। इसका सीधा असर उन भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है जिनकी लागत में ईंधन की हिस्सेदारी अधिक है।
बैंकिंग और ऑटो शेयरों पर दबाव
बाजार में मंगलवार को कई प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली देखने को मिली। बैंकिंग और ऑटो शेयरों पर दबाव रहा, जबकि कुछ ऊर्जा और आईटी कंपनियों के शेयरों ने बाजार को सहारा देने की कोशिश की। शुरुआती कारोबार में बजाज फिनसर्व, इंटरग्लोब एविएशन, टाइटन, एसबीआई, बजाज फाइनेंस और एक्सिस बैंक प्रमुख कमजोर शेयरों में शामिल रहे।
महंगे तेल का असर खास तौर पर एयरलाइंस, ऑटोमोबाइल और अन्य ईंधन-निर्भर क्षेत्रों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से ऊर्जा क्षेत्र की कुछ कंपनियों को फायदा मिलने की संभावना रहती है।
घरेलू अर्थव्यवस्था से मिला बाजार को सहारा
बाहरी दबाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े मजबूत आंकड़ों ने बाजार में बड़ी गिरावट को सीमित करने में मदद की। भारत की वास्तविक जीडीपी में अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो बाजार की उम्मीदों से बेहतर रही। हालांकि भू-राजनीतिक तनाव और महंगे तेल के कारण निवेशकों की चिंता बनी हुई है।
इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। सोमवार को एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 7,985.88 करोड़ रुपये की इक्विटी निकासी की थी, जिससे बाजार पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिला।
आगे बाजार की दिशा पर रहेगी कच्चे तेल और वैश्विक तनाव की नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में भारतीय शेयर बाजार की दिशा काफी हद तक अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति से जुड़े संकेतों पर निर्भर करेगी। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तथा तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो भारतीय बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।
हालांकि घरेलू आर्थिक वृद्धि मजबूत रहने से बाजार को कुछ आधार मिल रहा है। ऐसे में फिलहाल निवेशकों के लिए वैश्विक घटनाक्रम और तेल बाजार पर नजर रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।













