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आज मनाई जा रही तुलसीदास जयंती, जानिए गोस्वामी तुलसीदास के जीवन और रामचरितमानस से जुड़ी खास बातें

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि (19 अगस्त) को महान संत, महान कवि और भक्ति काल के ध्वजवाहक गोस्वामी तुलसीदास जी की पावन जयंती मनाई जा रही है। महर्षि वाल्मीकि के अवतार माने जाने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी ने संस्कृत में रचित रामकथा को अवधी (जनभाषा) में ढालकर घर-घर तक पहुँचाया। उनकी कालजयी रचना ‘श्रीरामचरितमानस’ ने न केवल हिंदी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय समाज को नैतिक मूल्यों और मर्यादा का पाठ पढ़ाया।

रहस्यमयी जन्म और बचपन का संघर्ष

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसीदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गाँव (कुछ मतों के अनुसार कासगंज के सोरों) में हुआ था।

  • 32 दाँत और पहला शब्द ‘राम’: कहा जाता है कि जन्म के समय वे रोए नहीं थे बल्कि उनके मुख से ‘राम’ शब्द निकला था, जिससे उनका बचपन का नाम ‘रामबोला’ पड़ा। जन्म के समय उनके मुख में पूरे 32 दाँत मौजूद थे।
  • अशुभ नक्षत्र और परित्याग: अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण जन्म के कुछ ही समय बाद उनकी माता हुलसी का निधन हो गया और पिता आत्माराम दुबे ने उन्हें त्याग दिया। एक दासी चुनिया ने उनका पालन-पोषण किया, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद बालक रामबोला को अनाथ बनकर भिक्षा मांगनी पड़ी। बाद में गुरु नरहरिदास ने उन्हें शरण दी और उनका नाम ‘तुलसीदास’ रखा।

पत्नी के उलाहने से मिला वैराग्य

तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली से हुआ था। वे अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार जब उनकी पत्नी अपने मायके गई थीं, तो तुलसीदास जी तूफानी रात में उफनती नदी पार करके उनसे मिलने पहुँचे। तब रत्नावली ने उन्हें उलाहना देते हुए कहा:

“हड़ माँस को देह यह, तासों जितना प्रीत। तासों आधा जो राम प्रति, होत न तौ भवभीत॥”

अर्थात, जितना प्रेम इस हाड़-मांस के शरीर से है, उसका आधा भी भगवान राम से होता, तो भवसागर पार हो जाते। इस बात ने तुलसीदास जी के मन पर गहरा प्रभाव डाला और वे गृहस्थ जीवन त्यागकर पूर्णतः रामभक्ति में लीन हो गए।

‘श्रीरामचरितमानस’ और अन्य अमर रचनाएँ

काशी और अयोध्या के घाटों पर रहकर तुलसीदास जी ने कई महान ग्रंथों की रचना की।

  • 2 वर्ष 7 महीने में रचा महाकाव्य: संवत 1631 की रामनवमी के दिन उन्होंने अयोध्या में ‘श्रीरामचरितमानस’ लिखना प्रारंभ किया, जिसे पूरा करने में 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन का समय लगा।
  • जनभाषा में ज्ञान का प्रसार: उस दौर में कठिन संस्कृत विद्वानों तक सीमित थी, लेकिन तुलसीदास जी ने लोकभाषा ‘अवधी’ को चुनकर आम जनमानस के लिए रामकथा के द्वार खोल दिए।
  • अन्य प्रमुख ग्रंथ: श्रीरामचरितमानस के अलावा उन्होंने हनुमान चालीसा, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, जानकी मंगल और बरवै रामायण जैसे लगभग 12 प्रमुख ग्रंथों की रचना की।

गोस्वामी तुलसीदास जी की रचनाएँ आज भी करोड़ों लोगों को जीवन में संबल, भक्ति और मर्यादा से जीने की राह दिखाती हैं।

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