
नई दिल्ली: देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। डिजिटल अरेस्ट स्कैम पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध की रोकथाम, ठगी की रकम की जल्द वापसी, बैंकिंग सिस्टम की सुरक्षा और पीड़ितों की मदद को लेकर कई अहम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने केंद्र, राज्य सरकारों, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI), बैंकों और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों से निपटने के लिए कुल 13 बिंदुओं पर निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने RBI को साइबर फ्रॉड से जुड़े बैंक खातों, खासकर म्यूल अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक Standard Operating Procedure (SOP) तैयार कर लागू करने को कहा है। इस SOP में संदिग्ध खातों पर अस्थायी डेबिट होल्ड लगाने, शिकायतों के निपटारे और ठगी गई रकम की वापसी की व्यवस्था को मजबूत करने की बात कही गई है।
कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी साइबर अपराध से निपटने की व्यवस्था को मजबूत करने का निर्देश दिया है। इसके तहत State Cyber Crime Coordination Centres को नोटिफाई और ऑपरेशनल करने तथा I4C के साथ मिलकर e-Zero FIR व्यवस्था को अपनाने पर जोर दिया गया है। साथ ही साइबर फ्रॉड के कारण फ्रीज किए गए बैंक खातों से जुड़े मामलों का जल्द निपटारा करने के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने को भी महत्वपूर्ण माना है। अदालत ने संबंधित कमेटी को राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और सरकारी विभागों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने को कहा है। इन अभियानों में डिजिटल अरेस्ट से बचाव, साइबर अपराध की शिकायत करने के तरीके और ठगी गई रकम की रिकवरी से जुड़ी व्यवस्थाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर रहेगा।
पीड़ितों को आर्थिक राहत दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने साझा दायित्व यानी Shared Liability और Victim Compensation Framework की संभावना पर भी विचार करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य साइबर ठगी के मामलों में पीड़ितों के लिए अधिक प्रभावी राहत व्यवस्था तैयार करना है। अदालत ने Legal Services Authorities को भी साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट स्कैम के प्रति लोगों को जागरूक करने तथा ठगी गई रकम की रिकवरी में सहायता के लिए योजनाएं तैयार करने को कहा है।
अदालत ने डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच को लेकर CBI की भूमिका को भी मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी को यह देखने को कहा गया है कि साइबर फ्रॉड की जांच के लिए CBI की मौजूदा वित्तीय सीमा को कम किया जा सकता है या नहीं। साथ ही एक ही संगठित साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े कई मामलों को एक साथ जोड़कर जांच करने की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट स्कैम में इस्तेमाल होने वाली ऑडियो और वीडियो कॉल को लेकर भी तकनीकी उपाय तलाशने को कहा है। MeitY, Department of Telecommunications और Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) को समय-आधारित “Kill Switch” जैसे विकल्प की तकनीकी व्यवहार्यता, प्रभाव और सुरक्षा उपायों की जांच करने को कहा गया है। इसका उद्देश्य ऐसे कॉल-आधारित साइबर फ्रॉड को बीच में रोकने के लिए तकनीकी समाधान तलाशना है।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में साइबर अपराधी अक्सर पुलिस, CBI, ED, कोर्ट, TRAI या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को फोन या वीडियो कॉल करते हैं। पीड़ित को किसी कथित अपराध में फंसाने या गिरफ्तारी का डर दिखाकर उससे पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम ऐसे संगठित साइबर अपराध नेटवर्क पर रोक लगाने और पीड़ितों को जल्द राहत देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हाल के वर्षों में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार के साथ साइबर अपराध का खतरा भी बढ़ा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से बैंकिंग संस्थानों, पुलिस, साइबर क्राइम एजेंसियों और सरकारी विभागों के बीच समन्वय मजबूत होने की उम्मीद है। साथ ही आम लोगों के लिए यह संदेश भी महत्वपूर्ण है कि कोई भी सरकारी अधिकारी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देता।
अगर किसी व्यक्ति के साथ साइबर ठगी हो जाती है तो उसे घबराने के बजाय तुरंत संबंधित साइबर अपराध व्यवस्था से संपर्क करना चाहिए और लेनदेन से जुड़ी जानकारी सुरक्षित रखनी चाहिए। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर धमकी देने वाले व्यक्ति के निर्देश पर पैसे ट्रांसफर करना या निजी बैंकिंग जानकारी साझा करना बेहद जोखिमपूर्ण हो सकता है।













