
पटना/भागलपुर/कटिहार:
बिहार के 14 जिलों में गंगा, कोसी, बागमती और पुनपुन जैसी प्रमुख नदियों के उफान से 43 लाख से अधिक आबादी प्रभावित हुई है। यद्यपि प्रशासन की ओर से सामुदायिक रसोइयाँ और NDRF/SDRF की टीमें तैनात की गई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सुदूर और दियारा (नदी तटीय) क्षेत्रों के बाढ़ प्रभावित गांवों तक समय पर राहत सामग्री और सूखा राशन पहुंचाना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
राहत कार्य में आ रही मुख्य चुनौतियाँ:
- सड़क संपर्क का टूटना: कई प्रखंडों में मुख्य सड़कों और पुल पुलियों के बह जाने या पानी में डूब जाने के कारण गाड़ियों से सूखा राशन या राहत पैकेट भेजना असंभव हो गया है।
- नावों की सीमित उपलब्धता: दूरदराज के जलमग्न टोलों तक पहुंचने के लिए देशी और सरकारी नावें ही एकमात्र सहारा हैं। हालांकि सैकड़ों नावें चलाई जा रही हैं, फिर भी मांग की तुलना में इनकी कमी के कारण राशन पहुंचने में देरी हो रही है।
- वितरण केंद्र पर अव्यवस्था व गुणवत्ता की शिकायतें: कई स्थानों पर भोजन की गुणवत्ता को लेकर बाढ़ पीड़ितों में असंतोष है। सामुदायिक रसोइयों में पतली दाल और खाने के घटिया स्तर को लेकर प्रशासनिक नाराजगी की खबरें भी सामने आई हैं। वहीं कई राहत स्थलों पर भोजन वितरण के दौरान अफरा-तफरी का माहौल बन रहा है।
- पीने के पानी और मवेशी चारे का संकट: बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हैंडपंप डूबने से शुद्ध पेयजल और मवेशियों के लिए सूखे चारे की भारी किल्लत महसूस की जा रही है।
प्रशासनिक कदम
आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, स्थिति को नियंत्रित करने के लिए 900 से अधिक कम्युनिटी किचन चलाए जा रहे हैं और लाखों लोगों को भोजन कराया जा चुका है। लेकिन पानी का फैलाव अधिक होने से प्रशासन के सामने हर पीड़ित परिवार तक सूखा राशन पैकेट, पॉलीथीन शीट और मेडिकल किट समय पर पहुंचाने की चुनौती लगातार बनी हुई है।













