पटना:
बिहार में ग्रामीण विकास योजनाओं के सही क्रियान्वयन और सरकारी फंड के दुरुपयोग को रोकने के लिए पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग ने कड़े कदम उठाए हैं। अब गांवों में चल रही पक्की गली-नाली, नल-जल योजना, और पंचायत सरकार भवनों के निर्माण कार्य की सीधी निगरानी डिजिटल माध्यमों से की जाएगी। इसके साथ ही ग्रामीणों की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए पंचायत स्तर पर ही शिकायत निवारण व्यवस्था को सक्रिय कर दिया गया है।
ऑनलाइन मॉनिटरिंग और सोशल ऑडिट पर जोर
विकास योजनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए राज्य सरकार ने प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए नया मॉनिटरिंग ढांचा लागू किया है:
- जियो-टैगिंग और डिजिटल ट्रैकिंग: पंचायतों में पूरी होने वाली हर सड़क, नाली और सार्वजनिक निर्माण कार्य की फोटो जियो-टैगिंग के साथ पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे धरातल पर हुए बिना कागजों पर काम दिखाने वाली गड़बड़ियों पर पूरी तरह रोक लगेगी।
- सोशल ऑडिट (सामाजिक अंकेक्षण): ग्राम सभाओं के माध्यम से योजनाओं का सोशल ऑडिट कराया जाएगा, जिसमें स्थानीय ग्रामीण खुद विकास कार्यों की गुणवत्ता और खर्च का ब्योरा परख सकेंगे।
ग्रामीण शिकायतों के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था
गांव के आम नागरिकों को अपनी छोटी-मोटी समस्याओं जैसे- पेंशन, राशन, सोलर स्ट्रीट लाइट और स्वच्छता संबंधी शिकायतों के लिए प्रखंड या जिला मुख्यालय का चक्कर न लगाना पड़े, इसके लिए डिजिटल और भौतिक केंद्र चालू किए गए हैं:
- पंचायत सरकार भवनों में समाधान केंद्र: राज्य के नवनिर्मित पंचायत सरकार भवनों में प्रत्येक सप्ताह ‘शिकायत निवारण शिविर’ लगाए जा रहे हैं, जहाँ पंचायत सचिव और मुखिया आम लोगों की अर्जियां स्वीकार कर रहे हैं।
- लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम: यदि पंचायत स्तर पर समस्या का समाधान निश्चित समय-सीमा में नहीं होता है, तो मामला स्वतः अनुमंडल लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के पास चला जाएगा।
पंचायती राज विभाग का निर्देश: “विकास योजनाओं की राशि में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता पाए जाने पर संबंधित एजेंसी और पंचायत प्रतिनिधियों पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। ग्रामीण विकास का सीधा लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना ही सरकार का मुख्य उद्देश्य है।”












