पटना:
बिहार में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के तहत जनप्रतिनिधियों के आरक्षण और उनकी अयोग्यता को लेकर पटना हाईकोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी नौकरियों और सेवाओं में लागू होने वाला आरक्षण कानून (1991) सीधे पंचायत चुनावों (जैसे मुखिया पद) पर लागू नहीं होगा।
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने 31 पन्नों का विस्तृत आदेश जारी करते हुए कहा कि पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों की पात्रता और आरक्षण का नियम ‘बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006’ की धारा 15(5) से ही तय होगा।
क्या था मामला? (पृष्ठभूमि)
यह पूरा मामला सहरसा जिले की ग्राम पंचायत राज सहुरिया के मुखिया मोहम्मद ईसा से जुड़ा है।
- 2021 के पंचायत चुनाव में मो. ईसा अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC – तेली/मुस्लिम) के लिए आरक्षित सीट से चुनाव जीतकर मुखिया बने थे।
- उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई कि उनका परिवार मूल रूप से जौनपुर (उत्तर प्रदेश) का निवासी है और उनके पूर्वज वहां से बिहार आए थे।
- जाति जांच समिति ने 1991 के सरकारी नौकरी वाले आरक्षण कानून (और 2003 के संशोधन) का हवाला दिया, जिसके तहत राज्य के बाहर के मूल निवासियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
- इसी रिपोर्ट के आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने 25 जून 2025 को मो. ईसा का चुनाव रद्द करते हुए उन्हें मुखिया पद से हटा दिया था।
हाईकोर्ट ने क्या-क्या कहा?
पटना हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) और जाति जांच समिति दोनों के आदेशों को रद्द (Quashed) कर दिया और मो. ईसा की अर्जी को स्वीकार कर लिया। कोर्ट की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
- चुनावी आरक्षण और सेवा आरक्षण अलग-अलग कानून: अदालत ने कहा कि सरकारी नौकरियों (Services) में आरक्षण और लोकतांत्रिक चुनावों (Elections) में प्रतिनिधित्व का आरक्षण दो बिल्कुल अलग कानूनी प्रणालियां हैं। नौकरी वाले नियमों को चुनाव पर थोपना कानूनन गलत है।
- 1991 के आरक्षण अधिनियम की सीमित भूमिका: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1991 के ‘बिहार पदों एवं सेवाओं में रिक्तियों का आरक्षण अधिनियम’ की भूमिका पंचायत चुनाव में सिर्फ इतनी ही है कि वह यह बताए कि पिछड़ा वर्ग (OBC/EBC) की श्रेणी में कौन-कौन सी जातियां आती हैं।
- निवासी होने का आधार: कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता के पूर्वज करीब 125 साल (3 से 4 पीढ़ियों) से बिहार में रह रहे हैं। उन्हें गैर-निवासी मानकर आरक्षण के अधिकार से वंचित करना अनुचित था।
भविष्य के पंचायत चुनावों पर क्या पड़ेगा असर?
- भ्रम दूर हुआ: इस फैसले से अब यह साफ हो गया है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों (मुखिया, समिति, जिला परिषद) में आरक्षण का दायरा केवल पंचायत राज कानून से ही संचालित होगा।
- जनप्रतिनिधियों को सुरक्षा: जाति छानबीन समिति या चुनाव आयोग अब सरकारी नौकरी के नियमों का हवाला देकर चुने हुए जनप्रतिनिधियों को सीधे अयोग्य घोषित नहीं कर पाएंगे।
बिहार में आगामी पंचायत चुनावों के परिसीमन की प्रक्रिया चल रही है, ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य के हजारों भावी उम्मीदवारों और जनप्रतिनिधियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।













